
राजगीर की पंच पहाड़ियों में शुमार विपुलांचलगिरी पर्वत पर उगी झाड़ियों में सोमवार की देर शाम आग लग गई। यह आग करीब हजारों फीट ऊंची पर्वत पर स्थित झाड़ियों में लगभग दो किलोमीटर लंबी धू धू कर अंधेरे में अग्नि लकीर की तरह चमक रही थी। जिस पर उठती आग की विशालकाय लपटों को कई किलोमीटर दूर नंगी आंखों से देखा जा सकता था। जिसके कारण बेशकीमती लकड़ी एवं जड़ी बूटी जलकर राख हो गई है ।
इस आग लगी की घटना की खबर पूरे शहर में शाम साढ़े सात बजे तक फ़ैल गई है। पर्वत पर लगी अचानक आग की लपटों देखकर फायर ब्रिगेड की वाहन मौके पर तो पहुंची जरूर। परंतु हजारों फीट ऊंचाई के कारण पर्वत पर आग पर काबू पाने में सक्षम नहीं हो रहा था। फायर स्पॉट होने तथा फायर ब्रिगेड के पास समुचित संसाधन नहीं होने के कारण उन्हें खाली हाथ वापस लौटने को विवश होना पड़ा ।
राजगीर के प्राकृतिक प्रचुर बेशकीमती खनिज संपदाओं तथा जड़ी बुटियों संसाधनों से लबरेज पंच पहाड़ियों में इस प्रकार की आग लगी की घटना कोई नई घटना नहीं है। अक्सर पर्वतों पर आग लगती रहती है लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि यह आग कैसे लगती है कौन लगाता है इसकी पहचान नहीं हो पाती है। पर्वत की ऊंचाई होने के कारण इस अगलगी की घटना को समझ पाना बहुत ही मुश्किल है । वन विभाग के पदाधिकारियों को भी इस अगलगी की घटना में सही जानकारी नहीं हो पाती है वैसे तो कहा जाता है कि कुछ लोग लकड़ी के जलावन के काम में उपयोग लाने के लिए आग लगा दी जाती है अगर इस तरह की बात होती है तो वन विभाग के पदाधिकारी एवं जिला प्रशासन को चाहिए कि इस पर रोक लगानी चाहिए। आज इस अगलगी की घटना से प्राकृतिक की ऐतिहासिक धरोहर को सूबे की सरकार ने सजाने व संवारने में लगी है। वही इस अगलगी की घटना से पर्वत पर पर्यावरण को संतुलित करने के लिए कई उपाय किए गए हैं लेकिन फिर भी वन विभाग के लापरवाही के कारण अक्सर इस अगलगी की घटना से बेशकीमती लकड़ियां जलकर राख हो जाती है। कई बार देखा गया है कि पर्वतों पर आग लगी की घटना होने के बावजूद भी वन विभाग के पदाधिकारी के द्वारा आग पर काबू पाने के लिए कोई भी संसाधन अभी तक नहीं जुटा पाए हैं। देखा जाए तो इस पर्वत के तलहटी में ही मखदूम कुंड व सूरजकुंड की बसावट है।