Home खास खबरें नवादा में वोटिंग का टूटा रिकॉर्ड, लेकिन 4 बूथों एक भी वोटर ने नहीं डाला वोट.. जानिए क्यों

नवादा में वोटिंग का टूटा रिकॉर्ड, लेकिन 4 बूथों एक भी वोटर ने नहीं डाला वोट.. जानिए क्यों

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नवादा लोकसभा सीट पर वोटिंग को लेकर मतदाताओं में पिछली बार से ज्यादा उत्साह देखा गया। पिछली बार जहां 50 फीसदी मतदाताओं ने वोट डाले थे। वहीं इस बार 52.50 फीसदी वोटरों ने मताधिकार का प्रयोग किया। लेकिन चार बूथ ऐसे भी थे जहां एक भी वोटर मतदान केंद्र तक नहीं आया। चुनाव अधिकारी के लाख प्रयासों के बावजूद कोई भी मतदाता वोट डालने के लिए बूथ तक आना मुनासिब नहीं समझा।

किन किन बूथों पर नहीं पड़ा वोट
नवादा लोकसभा सीट पर जिन चार बूथों पर एक भी मतदाता वोट डालने नहीं आया उसमें वारिसलीगंज विधानसभा, हिसुआ विधानसभा,रजौली विधानसभा और गोविंदपुर विधानसभा का एक-एक बूथ शामिल है । यहां के मतदाताओं ने मतदान का बहिष्कार किया।

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स्कूल शिफ्ट होने से नाराज
रजौली विधानसभा के बूथ संख्या 290 के मतदाताओं ने वोट बहिष्कार किया। रजौली के प्राथमिक विद्यालय पिछली का बूथ राजकीय प्राथमिक विद्यालय सतगीर शिफ्ट किए जाने से मतदाता नाराज थे। ऐसे में बूथ तक वोट डालने ग्रामीण नहीं पहुंचे। नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण बूथ को नए भवन में स्थानातरित किया गया था।

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रोड नहीं वोट नहीं
नवादा लोकसभा सीट के तीन बूथों पर मतदाताओं ने रोड नहीं होने के नाम पर वोट का बहिष्कार किया। उनका कहना था कि रोड नहीं तो वोट नहीं। रोड को लेकर जिन गांवों के लोगों वोटिंग का बहिष्कार किया है उसमें वारिसलीगंज विधानसभा के बूथ सं. 274 बलियारी बडीहा के मतदाता शामिल हैं। इसके अलावा गोविंदपुर विधानसभा के बूथ संख्या 29 पर बजबारा के लोगों ने वोट नहीं डाला। वहीं हिसुआ विधानसभा के बूथ सं. 145 पर नरहट प्रखंड के बाजितपुर के ग्रामीणों ने भी सड़क नहीं होने के कारण वोट बहिष्कार किया। इन तीनों गांव वालों का कहना है कि वोट के समय नेता आते हैं वादे कर कर चले जाते हैं लेकिन अब तक इस गांव में रोड नहीं आया है। उनका कहना है कि नेताओं को सबक सिखाने के लिए वे लोग वोट नहीं डाले

नालंदा लाइव की सलाह
वोट का बहिष्कार करने वाले लोगों को नालंदा लाइव की सलाह है कि वो मतदान का कभी बहिष्कार न करें। अगर आपको लगता है कि आपका नेता झूठा है तो आपको चुनाव आयोग ने एक अधिकार दिया। वो है नोटा का अधिकार। आप इस पर बटन दबाकर मतदान का नेताओं का विरोध कर सकते हैं। इससे ये फायदा होता है कि अगर नोटा के वोटों की संख्या सबसे ज्यादा रही तो उस सीट पर दोबारा मतदान कराया जाएगा। ऐसे में नेता आपकी ताकत को समझेंगे। अन्यथा ऐसे विरोध से उनका कुछ होने वाला नहीं है। चुनाव के बाद वो भूल जाएंगे।

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