Home काम की बात खुशखबरी.. सिलाव के खाजा को भारत सरकार से मिला GI टैग

खुशखबरी.. सिलाव के खाजा को भारत सरकार से मिला GI टैग

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नालंदा को एक नई पहचान मिली है। सिलाव के खाजा को अंतराष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए भारत सरकार ने जीआई टैग दिया है। इसके साथ ही सिलाव का खाजा बिहार की पहली मिठाई बन गई है जिसे भारत सरकार ने जीआई टैग की मान्यता दी है। जिसके साथ ही लाजवाब और अनूठे स्वाद वाले सिलाव के खाजा को बकायदा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान मिल गई है। आपको खाजा के इतिहास के बारे में भी बताएंगे। साथ ही ये भी बताएंगे कि अबतक किसे किसे मिल चुका है जीआई टैग, साथ ही जीआई टैग क्या होता है और इसके क्या फायदा होते हैं । तो सबसे पहले जानिए कि जीआई टैग क्या होता है।

क्या होता है जीआई टैग(GI TAG)
GI यानि Geographical Indication मतलब भौगोलिक संकेत । सामान्य रूप से इसका अर्थ निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में कृषि, प्राकृतिक या तैयार किए गए उत्पाद से है। भौगोलिक संकेत या भौगोलिक नाम एक विलक्षणता प्रदान करता है और गुणवत्ता का आश्वासन देता है। इसे ऐसे समझिए जैसे दार्जिलिंग की चाय, तिरुपति के लड्डू, कांगड़ा की पेंटिंग, नागपुर का संतरा, कश्मीर की पाश्मीना आदि जैसे दुनिया भर में मशहूर है वैसे ही अब सिलाव को खाजा के लिए दुनिया भर में जाना जाएगा

सरल शब्दों में समझें तो जीआई टैग या भौगोलिक संकेत एक प्रकार का मुहर है जो किसी भी उत्पाद के लिए प्रदान किया जाता है| इस मुहर के प्राप्त होने के जाने के बाद पूरी दुनिया में उस उत्पाद को महत्व प्राप्त हो जाता है साथ ही उस क्षेत्र को सामूहिक रूप से इसके उत्पादन का एकाधिकार प्राप्त हो जाता है। लेकिन इसके लिए शर्त है की उस उत्पाद का उत्पादन या प्रोसेसिंग उसी क्षेत्र में होना चाहिए जहाँ के लिए गई टैग (GI Tag) लिया जाना है।

भारत सरकार देती है GI Tag
जीआई टैग भारत सरकार सरकार की एजेंसी जीआई रजिस्ट्री देती है । जो चेन्नई में है । जीआई रजिस्ट्री ने बिहार सरकार को आधिकारिक तौर पर भी बता दिया कि सिलाव के खाजा को जीआई टैग (मार्क) मिला है। यानी, यह प्रमाणित किया गया कि सिलाव में बनने वाला खाजा अपनी गुणवत्ता और विशिष्टताओं के कारण दुनिया भर में अनूठा है। अब बिहार के अलावा कहीं और इस उत्पाद की बिक्री सिलाव के खाजा के रूप में नहीं की जा सकती है।

जीआइ टैग से क्या होता है फायदा
जीआइ टैग राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्पाद के अनूठेपन की प्रामाणिकता देता है। अब सिलाव के खाजा उत्पादक, अपने उत्पाद पर जीआई टैग लगाकर बिक्री कर सकते हैं। कुछ दिन पहले रसगुल्ला को लेकर बंगाल और ओडिशा के बीच जीआई टैग लेने के लिए लंबा विवाद चला था। अंततः बंगाल को जीआई टैग मिला।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर मिला जीआई टैग
सीएम नीतीश कुमार की पहल पर गठित बिहार विरासत विकास समिति ने सिलाव के खाजा को जीआई टैग दिलाने में खास भूमिका निभाई है। समिति ने सिलाव खाजा औद्योगिक स्वावलंबी सहकारी समिति के माध्यम से जीआई रजिस्ट्री (चेन्नई) को जीआइ टैग के लिए आवेदन भेजा था।

सिलाव के खाजा का इतिहास जानिए
बिहार विरासत समिति के मुताबिक सिलाव के खाजा की प्राचीनता मगध महाजनपद और नालंदा के इतिहास से जुड़ा हो सकता है। लेकिन सिलाव के खाजा के बारे में लिखित दस्तावेज पहली बार ब्रिटिश पुराविद बेगलर द्वारा 1872 में लिखित एक नोट में मिलता है ।

GI Tag के लाभ क्या हैं
-भौगोलिक संकेतक उत्पाद के लिये कानूनी संरक्षण प्रदान करता है।
-अन्य लोगों द्वारा किसी पंजीकृत भौगोलिक संकेतक के अनधिकृत प्रयोग को रोकता है।
-यह संबंधित भौगोलिक क्षेत्र में उत्पादित वस्तुओं के उत्पादकों की आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देता है।

बिहार में अबतक किसे किसे मिला है GI टैग
मुजफ्फरपुर की शाही लीची
भागलपुर का कतरनी चावल, तसर सिल्क और जर्दालु आम
नवादा का मगही पान, सिक्की कला, सुजनी
मधुबनी पेंटिंग्स, एप्लीक वर्क

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