‘जाति’ में उलझी नीतीश की शराबबंदी

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बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर जाति की सियासत उलझ गई है। 6 अप्रैल को शराबबंदी के दो साल पूरे होने पर सीएम नीतीश कुमार ने कहा था कि इस कानून का सबसे ज्यादा फायदा गरीबों खासकर दलितों और अन्य पिछड़ा वर्ग को मिला है। लेकिन आंकड़े नीतीश सरकार को गलत साबित कर रहे हैं। शराबबंदी कानून का सबसे ज्यादा खामियाजा इसी वर्ग के लोगों को भुगतना पड़ा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक शराबबंदी कानून के उल्लंघन में पटना, गया और मोतिहारी सर्किल की जेलों में कुल 1 लाख 22 हजार 392 कैदियों में 67.1 प्रतिशत दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग ही हैं। हैरानी इस बात की है कि शराबबंदी के बाद जितने दलित और ओबीसी लोगों को जेल में डाला गया, उनकी संख्या प्रदेश में उनकी कुल आबादी के शेयर से ज्यादा है। जैसे इस दौरान 27.1 प्रतिशत SC वर्ग के लोग गिरफ्तार किए गए। जबकि बिहार में इनकी आबादी 16 प्रतिशत ही है। 6.8 फीसदी ST वर्ग के लोग गिरफ्तार हुए…जबकि इनका कुल प्रतिशत 1.3 है। बिहार में कुल ओबीसी 25 प्रतिशत हैं..जबकि शराबबंदी के उल्लंघन में 34.4 प्रतिशत OBC गिरफ्तार हुए हैं। ऐसे में विपक्ष का आरोप है कि बिहार सरकार ने इस क़ानून के तहत बड़े लोगों पर शिकंजा नहीं कसा है। विपक्ष का कहना है कि जो लोग राज्य में शराब माफिया के रूप में काम कर रहे हैं। उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई

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