Home खास खबरें नीतीश कुमार को अपने ही गढ़ नालंदा में क्यों छूट रहे हैं पसीने.. जानिए

नीतीश कुमार को अपने ही गढ़ नालंदा में क्यों छूट रहे हैं पसीने.. जानिए

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को इस बार अपने ही घर में कड़ी चुनौती मिल रही है. हालात ये है कि नीतीश कुमार को एक तरह से गांव का गांव का दौरा करना पड़ रहा है. नीतीश कुमार ने सपने में भी नहीं सोचा था कि नालंदा लोकसभा सीट पर चुनाव जीतने के लिए उन्हें पसीना बहाना पड़ेगा. लेकिन साल 2019 का चुनाव उनके नंगे पांव हिमाचल पर्वत पर चढ़ाई करने के समान साबित हो रहा है. क्योंकि नीतीश कुमार जब जनता से पूछते हैं कि क्या कौशलेंद्र कुमार को जीत की माला पहना दें.. तो बीच भीड़ से आवाज आती है.. साहब इस बार राह मुश्किल है. आज हम इसे समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर नीतीश कुमार अपने ही गढ़ में आखिर घिरे हुए क्यों महसूस कर रहे हैं?

विरोध के बावजूद कौशलेंद्र कुमार पर दांव लगाना
नालंदा से दो बार सांसद रह चुके कौशलेंद्र कुमार का इलाके में भारी विरोध है. पार्टी, संगठन से लेकर कार्यकर्ता तक कौशलेंद्र कुमार के कामकाज से खुश नहीं है. नीतीश कुमार ने लोगों की राय जानने के लिए नालंदा से नेताओं को भी बुलाया था. नाम न छापने की शर्त पर मीटिंग में मौजूद एक स्थानीय नेता ने कहा कि , जब हमने कौशलेंद्र कुमार के नाम का विरोध किया और कहा कि साहब क्षेत्र में उनके खिलाफ काफी नाराजगी है. तो नीतीश कुमार ने कहा कि नालंदा के लिए भी हमें आपलोगों से पूछकर टिकट देना होगा. नालंदा में जिसे टिकट दे देंगे वही जीतेगा. ये नीतीश कुमार का भरोसा था नालंदा में किए गए काम का. नीतीश कुमार ने अपने खासमखास कौशलेंद्र कुमार को तीसरी बार टिकट दे दिया. जबकि इलाके के लोग उम्मीदवार बदलने की मांग कर रहे थे. यानि विरोध के बावजूद कौशलेंद्र कुमार को टिकट देना नीतीश कुमार पर भारी पड़ता दिख रहा है. हालांकि जदयू उम्मीदवार कौशलेंद्र कुमार अपनी जीत के प्रति आश्वस्त हैं. कौशलेंद्र कुमार ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि 2014 में तो हम अकेले चुनाव लड़े थे और जीत हासिल की थी. इस बार तो रामविलास पासवान जी भी साथ में हैं, एनडीए है तो कहीं ज़्यादा समर्थन मुझे मिल रहा है

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कुर्मी मतदाताओं का पलायन
नालंदा लोकसभा सीट में सबसे ज्यादा वोट कुर्मी जाति का है. यहां करीब 4 लाख 12 हजार कुर्मी वोटर हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक बिहार राज्य में सबसे ज्यादा पलायन नालंदा जिला में है. कहा जाता है कि सबसे ज्यादा पलायन कुर्मी जाति में ही है. क्योंकि नालंदा में इस जाति के लोग सबसे ज्यादा पढ़े लिखे और नौकरियों वाले हैं. ऐसे में वो नौकरी पेशा के चक्कर में दूसरे शहर या राज्यों में शिफ्ट हो गए हैं. ऐसे में कुर्मी वोटरों की वास्तविक संख्या बहुत कम है . जिससे नीतीश कुमार की परेशानी को बढ़ा दिया है.

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कुर्मी मतदाताओं में उदासीनता
हमने कुर्मी जाति के कई वोटरों से बात की. उन्हें नीतीश कुमार पर पूरा भरोसा है. लेकिन कौशलेंद्र कुमार को लेकर उनमें खासी नाराजगी है. वे कहते हैं कि नीतीश कुमार को इन्हें टिकट नहीं देना चाहिए था. कुर्मी जाति के कुछ युवा वोटरों का कहना है कि वो भले ही महागठबंधन को वोट ना दे. लेकिन कौशलेंद्र कुमार को भी वोट नहीं देंगे. उनका कहना है कि चाहे तो वे वोट नहीं देंगे और अगर देने चले गए तो शायद उनकी प्राथमिकता नोटा होगा. यानि नोटा भी कौशलेंद्र कुमार की राह में रोड़े अटका सकता है

अति पिछड़ा वोटों का बंटवारा
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महादलित वर्ग का गठन कर बिहार में एक नई सोशल इंजीनियरिंग को जन्म दिया था. महादलित वोटरों को नीतीश कुमार का पारंपरिक वोटर माना जाने लगा था. लेकिन महागठबंधन ने नालंदा लोकसभा सीट से अति पिछड़ी जाति के अशोक कुमार आजाद को टिकट देकर समीकरण बिगाड़ दिया. अशोक कुमार आजाद चंद्रवंशी समाज से आते हैं. ऐसे माना जा रहा है कि पूरा चंद्रवंशी समाज इस बार एकजुट है और वो इस बार अशोक कुमार आजाद के पक्ष में मतदान करने का फैसला किया है. एनडीए के कई नेता जो चंद्रवंशी समाज से आते हैं वो नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि इस बार तो मौका मिला है समाज के लिए कुछ करने का. अब जब मौका मिला है तो फायदा उठना तो चाहिए. महागठबंधन के उम्मीदवार अशोक आज़ाद का कहना है कि पिछले 20 सालों से नीतीश कुमार यहां के अति पिछड़ों का हक मारकर बैठे हुए हैं. अब यहां की जनता उनसे अपना हक चाहती है.

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कुशवाहा वोटरों से डैमेज का डर
नीतीश कुमार को कुशवाहा वोटरों के टूटने का भी डर सता रहा है. क्योंकि उपेंद्र कुशवाहा इस बार महागठबंधन के साथ हैं. उपेंद्र कुशवाहा बार-बार नीतीश कुमार पर कुशवाहा जाति की उपेक्षा का आरोप लगा रहे हैं. ऐसे अगर कुशवाहा वोटर नीतीश कुमार का साथ छोड़ते हैं तो उनकी मुश्किलें और बढ़ सकती है. इसलिए नीतीश कुमार नालंदा में चुनाव प्रचार के दौरान बिहारशरीफ से बीजेपी विधायक डॉक्टर सुनील को अपने साथ रखते हैं. डॉक्टर सुनील कुशवाहा जाति से हैं.

इतिहास बदलने की फिराक में आरजेडी
नालंदा के युवा राजद के जिला अध्यक्ष सुनील यादव का कहना है कि महागठबंधन पांच पार्टियों का गठबंधन है और हम सब लोग एकजुट होकर आज़ाद जी को जिताने की कोशिशों में जुटे हैं. साथ ही उनका ये भी कहना है कि ये मौका है कि नालंदा का इतिहास बदला जा सकता है . नालंदा में यादव वोटरों की संख्या तीन लाख है.

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मुस्लिम वोटरों की कट्टी
मुस्लिम वोटर इस बार महागठबंधन के साथ है जो नीतीश कुमार के लिए बड़ी सिरदर्द साबित हो रहा है. हमने जब कुछ मुस्लिम वोटरों से बात की तो उनका कहना था कि नीतीश कुमार को हम पसंद करते हैं. उन्होंने सूबे और हमारे समाज विकास किया है. लेकिन वो बीजेपी के साथ हैं ऐसे में सवाल ही नहीं उठता है कि हम नीतीश कुमार की पार्टी को वोट करेंगे. उनका कहना है अगर नीतीश कुमार बीजेपी अलग होकर चुनाव लड़ते तो हम उन्हें वोट करते . लेकिन इस बार तो सवाल ही नहीं उठता है .

मांझी-रविदास और बेलदार की तिकड़ी
नालंदा लोकसभा सीट पर इस बार नीतीश कुमार को जो सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है वो है मांझी रविदास और बेलदार की तिकड़ी. इन तीनों जातियों को मिलाकर करीब तीन लाख वोटर हैं. जीतनराम मांझी की वजह से मांझी और रविदास वोटर हम यानि महागठबंधन के साथ है. तो वहीं, मुकेश सहनी की वजह से बेलदार वोटर महागठबंधन को वोट देने की बात कर रहा है. ये एकमुश्त वोट है जो नीतीश कुमार के पसीने छूट रहे हैं.

पानी और सड़क की समस्या
नालंदा में इस वक्त भीषण गर्मी पड़ रही है. ऐसे में नालंदा जिला के अधिकतर हिस्से में पीने के पानी की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई. लोग सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. साथ ही कई गांव में सड़क की मांग को लेकर भी लोगों ने विरोध किया है. इन मुद्दों को लेकर लोगों ने वोट के बहिष्कार करने का फैसला लिया है

नीतीश कुमार नालंदा में करेंगे कैंप
हमने जदयू के कई नेताओं से जमीनी हालत के बारे में जानने की कोशिश की. जो गांव गांव जाकर जनसंपर्क अभियान कर रहे हैं. उन नेताओं ने नाम न छापने के शर्त पर कहा कि नालंदा में नीतीश कुमार को अभी और जोर लगाना पड़ेगा. कुछ लोगों ने तो यहां तक कह डाला कि जब दो-तीन दिन बचेगा तो नीतीश जी तो यहां कैंप भी कर देंगे. पिछली बार भी उन्हें करना पड़ा था. काफी ज़ोर आजमाइश करने के बाद भी 2014 में कौशलेंद्र कुमार दस हज़ार से भी कम वोट से चुनाव जीतने में कामयाब हुए थे. तब आरजेडी और राम विलास पासवान की पार्टी का गठबंधन था और यहां से लोजपा के उम्मीदवार को तीन लाख से ज़्यादा वोट मिले थे.

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